अहिच्छत्र धम्महाल, बरेली में डॉ. रामविलास भारती का धम्मांजलि समारोह आयोजित

बरेली। आशा बुद्धप्रिय फाउंडेशन के संस्थापक डॉ. बी.आर. बुद्धप्रिय की अध्यक्षता में 4 अक्टूबर 2026 को अहिच्छत्र धम्महाल, आनंद विहार, संजय नगर, बरेली में डॉ. रामविलास भारती का धम्मांजलि समारोह आयोजित किया गया। समारोह में उपस्थित लोगों ने डॉ. रामविलास भारती के सामाजिक, शैक्षिक और वैचारिक योगदान का स्मरण करते हुए उन्हें धम्मांजलि अर्पित की। … आगे पढें

‘बहुजन’ शब्द का भ्रमजाल

भारतीय सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में कुछ ऐसे शब्द प्रचलित हुए हैं, जिनका आकर्षण उनके वास्तविक अर्थ से अधिक होता है। ऐसे शब्द सुनने में व्यापक, न्यायपूर्ण और जनपक्षीय प्रतीत होते हैं। किंतु जब उनके अर्थ और उनके प्रयोग की गंभीर समीक्षा की जाती है, तो उनके भीतर छिपे हुए अनेक अंतर्विरोध सामने आते हैं। ‘बहुजन’ ऐसा ही एक शब्द है। आज यह शब्द राजनीति, समाज, संस्कृति और साहित्य—सभी क्षेत्रों में बार-बार प्रयुक्त किया जाता … आगे पढें

दलित, पददलित और महादलित की अवधारणा बनाम “हम दलित नहीं”

भारतीय समाज में वंचित समुदायों की पहचान को लेकर अनेक शब्द प्रचलित हुए हैं। इनमें “पददलित”, “दलित” और “महादलित” प्रमुख हैं। इन शब्दों को सामान्यतः सामाजिक न्याय, प्रतिरोध और मुक्ति की राजनीति से जोड़कर देखा जाता है। किंतु किसी भी अवधारणा का मूल्यांकन केवल उसके ऐतिहासिक उपयोग से नहीं, बल्कि उसके वैचारिक परिणामों से किया … आगे पढें

संत रविदास के काव्य में बौद्ध चिंतन

संतकवि रविदास जी के जीवन परिचय और उनकी विचारधारा के विषय में विद्वानों में पर्याप्त मतभेद है। हिंदू विद्वान उन्हें एक हिंदू भक्त के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जबकि बौद्ध विद्वान उन्हें बौद्ध विरासत का पुरोधा कहते हैं। संत रविदास जी के पंथ का अनुसरण करने वाले लोग उनके नाम पर ‘रविदासिया धर्म’ की … आगे पढें

आंबेडकरवाद : दिशा एवं दृष्टि 

आंबेडकरवाद के संदर्भ में भ्रमित लोगों के भ्रम-निवारण हेतु ही ‘आंबेडकरवादी साहित्य’ पत्रिका के इस अंक का विषय ‘आंबेडकरवाद : दिशा एवं दृष्टि’ रखा गया है। आंबेडकरवाद को सम्यक रूप में समझने के लिए सर्वप्रथम ‘वाद’ का आशय समझना अनिवार्य है। शब्दकोश के अनुसार ‘वाद’ का अर्थ है, “वह दार्शनिक सिद्धांत, जिसके अनुसार संसार की … आगे पढें

अस्पृश्यता, जातिगत भेदभाव, डॉ० आंबेडकर और बौद्ध धम्म

हजारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा। अल्लामा इक़बाल के इस शेर का वाच्यार्थ यह है कि अपनी सुंदरता से अनजान नरगिस (एक प्रकार का फूल) हजारों सालों तक अपनी बेनूरी (अंधेपन) पर रोती रहती है कि मुझमें कोई गुण, आकर्षण या सुन्दरता नहीं है। … आगे पढें

आंबेडकरवादी कहानी की सम्यक परंपरा

लीक-लीक गाड़ी चले, लीकहिं चले कपूत। लीक छाँड़ि तीनों चलें, शायर सिंह सपूत।। भारतेंदु हरिश्चंद्र जी का उक्त दोहा परंपरा का अंधानुकरण न करने की सीख देता है। ध्यातव्य है कि न तो हर पुरानी परंपरा गलत होती है और न ही हर नयी परंपरा सही होती है। क्योंकि नयी परंपरा ही पुरानी परंपरा का … आगे पढें

आंबेडकरवादी साहित्य : प्रतिरोध नहीं, पुनर्रचना का अनुशासन

समय का सबसे बड़ा संकट यह है कि विचार की जगह प्रतीक ने ले ली है। डॉ. आंबेडकर का नाम सर्वत्र उच्चारित हो रहा है, परंतु उनका दर्शन उसी अनुपात में अनुपस्थित है। चित्रों और नारों की बहुलता ने अध्ययन और चिंतन की गंभीरता को प्रतिस्थापित कर दिया है। भीमराव रामजी आंबेडकर ने जिस सामाजिक … आगे पढें