‘नमो बुद्धाय – जय भीम’ अभिवादन का अभिप्राय

आंबेडकरवादी लोग आपस में अभिवादन के रूप में प्रायः ‘नमो बुद्धाय – जय भीम’ शब्द का प्रयोग करते हैं। इस अभिवादन को सुनकर कुछ लोग आपत्ति करते हैं और यह तर्क देते हैं कि अभिवादन के रूप में केवल बुद्ध और आंबेडकर का स्मरण करना उचित नहीं है। ऐसे लोग अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और … आगे पढें

आंबेडकर-मिशन के प्रचार-प्रसार हेतु सबसे सशक्त साहित्यिक विधा है- ‘गीत’

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंजिल मगर, लोग साथ आते गये और कारवाँ बनता गया। मजरूह सुल्तानपुरी ने किसे ध्यान में रखकर यह शेर लिखा है? यह तो पता नहीं, लेकिन यह शेर तथागत बुद्ध, संत रैदास, संत कबीर, महामना ज्योतिराव फुले और बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर आदि महापुरुषों के व्यक्तित्व पर पूरी तरह … आगे पढें

गुरु रविदास जी के जीवन-चरित्र से संबंधित भ्रांतियों का निवारण

ऐसा चाहूँ राज मैं, जहाँ मिलै सबन को अन्न। छोट-बड़ौ सब सम बसैं, रविदास रहैं प्रसन्न।। उक्त दोहे (साखी) के माध्यम से एक आदर्श राज्य की कामना करने वाले, बेगमपुरा शहर की कल्पना करने वाले, समतावादी संत, क्रांतिकारी कवि और समाज-सुधारक सदगुरु रविदास जी के जीवन-चरित्र और उनकी वाणी से संबंधित अनेक भ्रांतियाँ भारतीय समाज … आगे पढें

दलित, पददलित और महादलित की अवधारणा बनाम “हम दलित नहीं”

भारतीय समाज में वंचित समुदायों की पहचान को लेकर अनेक शब्द प्रचलित हुए हैं। इनमें “पददलित”, “दलित” और “महादलित” प्रमुख हैं। इन शब्दों को सामान्यतः सामाजिक न्याय, प्रतिरोध और मुक्ति की राजनीति से जोड़कर देखा जाता है। किंतु किसी भी अवधारणा का मूल्यांकन केवल उसके ऐतिहासिक उपयोग से नहीं, बल्कि उसके वैचारिक परिणामों से किया … आगे पढें

आंबेडकरवाद : दिशा एवं दृष्टि 

आंबेडकरवाद के संदर्भ में भ्रमित लोगों के भ्रम-निवारण हेतु ही ‘आंबेडकरवादी साहित्य’ पत्रिका के इस अंक का विषय ‘आंबेडकरवाद : दिशा एवं दृष्टि’ रखा गया है। आंबेडकरवाद को सम्यक रूप में समझने के लिए सर्वप्रथम ‘वाद’ का आशय समझना अनिवार्य है। शब्दकोश के अनुसार ‘वाद’ का अर्थ है, “वह दार्शनिक सिद्धांत, जिसके अनुसार संसार की … आगे पढें

अस्पृश्यता, जातिगत भेदभाव, डॉ० आंबेडकर और बौद्ध धम्म

हजारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा। अल्लामा इक़बाल के इस शेर का वाच्यार्थ यह है कि अपनी सुंदरता से अनजान नरगिस (एक प्रकार का फूल) हजारों सालों तक अपनी बेनूरी (अंधेपन) पर रोती रहती है कि मुझमें कोई गुण, आकर्षण या सुन्दरता नहीं है। … आगे पढें

आंबेडकरवादी कहानी की सम्यक परंपरा

लीक-लीक गाड़ी चले, लीकहिं चले कपूत। लीक छाँड़ि तीनों चलें, शायर सिंह सपूत।। भारतेंदु हरिश्चंद्र जी का उक्त दोहा परंपरा का अंधानुकरण न करने की सीख देता है। ध्यातव्य है कि न तो हर पुरानी परंपरा गलत होती है और न ही हर नयी परंपरा सही होती है। क्योंकि नयी परंपरा ही पुरानी परंपरा का … आगे पढें

आंबेडकरवादी साहित्य : प्रतिरोध नहीं, पुनर्रचना का अनुशासन

समय का सबसे बड़ा संकट यह है कि विचार की जगह प्रतीक ने ले ली है। डॉ. आंबेडकर का नाम सर्वत्र उच्चारित हो रहा है, परंतु उनका दर्शन उसी अनुपात में अनुपस्थित है। चित्रों और नारों की बहुलता ने अध्ययन और चिंतन की गंभीरता को प्रतिस्थापित कर दिया है। भीमराव रामजी आंबेडकर ने जिस सामाजिक … आगे पढें