‘बहुजन’ शब्द का भ्रमजाल

भारतीय सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में कुछ ऐसे शब्द प्रचलित हुए हैं, जिनका आकर्षण उनके वास्तविक अर्थ से अधिक होता है। ऐसे शब्द सुनने में व्यापक, न्यायपूर्ण और जनपक्षीय प्रतीत होते हैं। किंतु जब उनके अर्थ और उनके प्रयोग की गंभीर समीक्षा की जाती है, तो उनके भीतर छिपे हुए अनेक अंतर्विरोध सामने आते हैं। ‘बहुजन’ ऐसा ही एक शब्द है। आज यह शब्द राजनीति, समाज, संस्कृति और साहित्य—सभी क्षेत्रों में बार-बार प्रयुक्त किया जाता … आगे पढें

डॉ. आंबेडकर के 135वें जयंती महोत्सव में सामाजिक न्याय, धम्म और आंबेडकरवादी चेतना पर हुआ विमर्श 

आंबेडकर महासभा आयोजन समिति, उत्तर प्रदेश (पजीकृत) एवं डॉ. आंबेडकर बहुजन विकास समिति (पंजीकृत) के संयुक्त तत्वावधान में डॉ. भीमराव आंबेडकर का 135वाँ जयंती महोत्सव दिनांक 12 अप्रैल 2026 को सेक्टर ई-7, ट्रिनिटी स्कूल के निकट, हरदोई रोड, दुबग्गा, लखनऊ में गरिमापूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ अधिवक्ता एस.पी. सुमन एडवोकेट, हाईकोर्ट, … आगे पढें

अस्पृश्यता, जातिगत भेदभाव, डॉ० आंबेडकर और बौद्ध धम्म

हजारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा। अल्लामा इक़बाल के इस शेर का वाच्यार्थ यह है कि अपनी सुंदरता से अनजान नरगिस (एक प्रकार का फूल) हजारों सालों तक अपनी बेनूरी (अंधेपन) पर रोती रहती है कि मुझमें कोई गुण, आकर्षण या सुन्दरता नहीं है। … आगे पढें

आंबेडकरवादी साहित्य : प्रतिरोध नहीं, पुनर्रचना का अनुशासन

समय का सबसे बड़ा संकट यह है कि विचार की जगह प्रतीक ने ले ली है। डॉ. आंबेडकर का नाम सर्वत्र उच्चारित हो रहा है, परंतु उनका दर्शन उसी अनुपात में अनुपस्थित है। चित्रों और नारों की बहुलता ने अध्ययन और चिंतन की गंभीरता को प्रतिस्थापित कर दिया है। भीमराव रामजी आंबेडकर ने जिस सामाजिक … आगे पढें