भारतीय समाज में वंचित समुदायों की पहचान को लेकर अनेक शब्द प्रचलित हुए हैं। इनमें “पददलित”, “दलित” और “महादलित” प्रमुख हैं। इन शब्दों को सामान्यतः सामाजिक न्याय, प्रतिरोध और मुक्ति की राजनीति से जोड़कर देखा जाता है। किंतु किसी भी अवधारणा का मूल्यांकन केवल उसके ऐतिहासिक उपयोग से नहीं, बल्कि उसके वैचारिक परिणामों से किया जाना चाहिए। यही वह बिंदु है जहाँ “हम दलित नहीं” का कथन एक गंभीर बौद्धिक प्रश्न के रूप में सामने आता है। यह केवल शब्द बदलने की मांग नहीं है, बल्कि पहचान की उस पूरी पद्धति की समीक्षा है जो किसी समुदाय को उसके दमन के आधार पर परिभाषित करती है।
“पददलित” और “दलित” दोनों शब्द मूलतः उत्पीड़न की स्थिति को व्यक्त करते हैं। इनका अर्थ उस व्यक्ति या समुदाय से है जिसे सामाजिक व्यवस्था ने दबाया, कुचला या अधिकारों से वंचित किया। इतिहास के अध्ययन में ऐसे शब्दों का महत्व हो सकता है, क्योंकि वे सामाजिक अन्याय की वास्तविकताओं की ओर संकेत करते हैं। किंतु समस्या तब उत्पन्न होती है जब इतिहास की व्याख्या के लिए प्रयुक्त शब्द को ही स्थायी आत्मपहचान का आधार बना दिया जाता है। कोई भी समुदाय अपने संघर्षों को स्मरण रख सकता है, लेकिन अपनी संपूर्ण पहचान को संघर्ष और अपमान की भाषा में स्थायी नहीं कर सकता।
यह प्रश्न केवल भाषाई नहीं, बल्कि दार्शनिक है। क्या मनुष्य की पहचान उसके ऊपर हुए अत्याचार से निर्धारित होगी या उसकी चेतना, उसके अधिकारों और उसके भविष्य से? यदि कोई व्यक्ति स्वयं को बार-बार उसी शब्द से परिभाषित करता है जिसका अर्थ दबा हुआ, कुचला हुआ या उत्पीड़ित है, तो वह अनजाने में अपने ऊपर थोपी गई ऐतिहासिक स्थिति को ही अपनी मूल पहचान का आधार बना रहा है। मुक्ति का दर्शन व्यक्ति को उसकी पराधीन अवस्था से निकालकर स्वतंत्र और सम्मानजनक स्थिति में स्थापित करता है; वह उसे स्थायी रूप से उसी पराधीनता की भाषा में नहीं बाँधता।
यहीं से “दलित” अवधारणा की वैचारिक सीमा दिखाई देने लगती है। यह शब्द सामाजिक अन्याय की ओर संकेत करने में उपयोगी हो सकता है, किंतु जब इसे स्थायी सामाजिक परिचय के रूप में स्थापित किया जाता है, तब यह व्यक्ति को उसके वर्तमान और भविष्य के बजाय उसके अतीत से बाँध देता है। सामाजिक परिवर्तन का उद्देश्य उत्पीड़न की संरचनाओं का अंत करना है, न कि उत्पीड़न से निर्मित पहचान को स्थायी बनाना। यदि किसी आंदोलन का अंतिम परिणाम यह हो कि समुदाय स्वयं को सदैव उसी नाम से पुकारता रहे जो उसके दमन की स्मृति से निर्मित हुआ था, तो यह स्थिति गंभीर पुनर्विचार की मांग करती है।
इस संदर्भ में “महादलित” की अवधारणा और भी अधिक समस्याग्रस्त दिखाई देती है। यह शब्द सामाजिक न्याय की अवधारणा को स्पष्ट करने के बजाय दलित समाज के भीतर कृत्रिम विभाजन पैदा करता है। यह सामाजिक परिवर्तन का नहीं, बल्कि सामाजिक विखंडन का शब्द है। यदि “दलित” की व्यापक श्रेणी पर्याप्त होती, तो उसके भीतर एक नई श्रेणी निर्मित करने की आवश्यकता ही क्यों पड़ती? “महादलित” का निर्माण यह संकेत देता है कि पहचान की राजनीति लगातार नई उपश्रेणियाँ पैदा करती है और अंततः एकता के स्थान पर विभाजन को जन्म देती है। इससे वास्तविक प्रश्न—शिक्षा, आर्थिक अवसर, सामाजिक सम्मान, प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकार—पृष्ठभूमि में चले जाते हैं और शब्दावली स्वयं बहस का केंद्र बन जाती है।
यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि “हम दलित नहीं” का कथन इतिहास का निषेध नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं कि जातिगत भेदभाव, अस्पृश्यता या सामाजिक अन्याय के अनुभवों को नकार दिया जाए। इतिहास को नकारना और इतिहास को पहचान का स्थायी आधार बना लेना—दोनों ही अतिवादी स्थितियाँ हैं। इतिहास को समझना आवश्यक है, किंतु भविष्य का निर्माण इतिहास की पीड़ा को ही अंतिम परिचय बनाकर नहीं किया जा सकता।
“हम दलित नहीं” का वास्तविक आशय यह है कि कोई भी समुदाय अपने ऊपर थोपी गई स्थिति से अधिक है। उसकी पहचान केवल इस बात से निर्धारित नहीं होती कि उसके साथ क्या हुआ, बल्कि इस बात से भी होती है कि वह क्या सोचता है, किन मूल्यों में विश्वास करता है और किस दिशा में आगे बढ़ना चाहता है। किसी व्यक्ति या समुदाय को केवल उसके दमन के इतिहास से परिभाषित करना उतना ही अधूरा है जितना उसके इतिहास को पूरी तरह भूल जाना।
अकादमिक दृष्टि से भी उत्पीड़न-आधारित पहचानें एक सीमा के बाद समस्या उत्पन्न करती हैं। वे प्रारंभिक चरण में अन्याय को चिह्नित करने का कार्य करती हैं, किंतु जब वे स्थायी पहचान बन जाती हैं तो व्यक्ति और समुदाय को एक निश्चित मनोवैज्ञानिक और वैचारिक ढाँचे में बाँध देती हैं। परिणामस्वरूप पहचान का केंद्र अधिकार, क्षमता, ज्ञान और उपलब्धि नहीं, बल्कि पीड़ा और वंचना बन जाती है। यह स्थिति सामाजिक आत्मविश्वास के विकास में बाधक सिद्ध हो सकती है।
किसी भी स्वाभिमानी समाज का लक्ष्य अपने घावों को समझना होता है, घावों को ही अपना परिचय बना लेना नहीं। “पददलित”, “दलित” और “महादलित” जैसी संज्ञाएँ इतिहास, समाजशास्त्र और राजनीति के अध्ययन में उपयोगी हो सकती हैं, किंतु उन्हें अंतिम और अनिवार्य आत्मपहचान मान लेना उचित नहीं है। मनुष्य की पहचान उसके दमन से नहीं, उसकी गरिमा से निर्मित होनी चाहिए; उसके अपमान से नहीं, उसके अधिकार-बोध से; उसकी पराजय से नहीं, उसकी चेतना से।
इसलिए “हम दलित नहीं” केवल एक नारा नहीं है। यह उस वैचारिक आग्रह का प्रतिपक्ष है जो वंचित समुदायों को स्थायी रूप से उनकी पीड़ा के नाम से पहचानना चाहता है। यह आत्मसम्मान, आत्मनिर्णय और सम्मान-आधारित पहचान की घोषणा है। सामाजिक न्याय का लक्ष्य “दलित”, “पददलित” या “महादलित” जैसी नई-नई संज्ञाओं का विस्तार नहीं, बल्कि ऐसी सामाजिक व्यवस्था का निर्माण है जहाँ किसी मनुष्य को अपनी पहचान व्यक्त करने के लिए दमन और वंचना की शब्दावली का सहारा न लेना पड़े। यही “हम दलित नहीं” की मूल वैचारिक सार्थकता है।
✍️ देवचंद्र भारती ‘प्रखर’
संपादक, ‘आंबेडकरवादी साहित्य’ पत्रिका