आडंबर-मिशन पुस्तक | आंबेडकरवादी साहित्य प्रकाशन

आडंबर-मिशन (समसामयिक समाज पर आंबेडकरवादी आलोचनात्मक विश्लेषण) देवचंद्र भारती ‘प्रखर’ का निबंध-संग्रह है। पुस्तक का केंद्र आंबेडकर-मिशन की वह स्थिति है, जहाँ विचार और आचरण के बीच का अंतर लगातार बढ़ता दिखाई देता है। आंबेडकर के नाम का सार्वजनिक जीवन में जितना विस्तार हुआ है, क्या उसी अनुपात में उनके विचारों की समझ और प्रतिबद्धता … आगे पढें

धम्म-चर्चा पुस्तक | आंबेडकरवादी साहित्य प्रकाशन

धम्म-चर्चा धम्म को केवल धार्मिक अवधारणा के रूप में देखने के बजाय उसके सामाजिक, नैतिक और व्यावहारिक पक्षों को समझने की दिशा में ले जाने वाली वैचारिक पुस्तक है। इसमें धम्म से जुड़े उन प्रश्नों पर विचार किया गया है, जिन्हें प्रायः रूढ़ धारणाओं और पूर्वनिर्धारित मान्यताओं के कारण ठीक से समझा नहीं जाता। पुस्तक … आगे पढें

धम्म-चर्चा अभियान : विचार से व्यवस्था तक

धम्म-चर्चा कोई सामान्य गतिविधि नहीं है। यह एक संगठित वैचारिक प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य धम्म को जीवन, समाज और संविधान के साथ जोड़कर समझना और स्थापित करना है। यहाँ धम्म केवल कहा नहीं जाता, बल्कि उसे खोला जाता है, परखा जाता है और व्यवहार में उतारने की दिशा दी जाती है। धम्म-चर्चा अभियान का मूल … आगे पढें

आंबेडकरवादी साहित्य प्रकाशन : स्वरूप, उद्देश्य और कार्य-दृष्टि

आंबेडकरवादी साहित्य प्रकाशन किसी जनसंगठन, अभियान या सदस्यता-आधारित संस्था के रूप में स्थापित नहीं है। इसका स्वरूप मूलतः एक वैचारिक-संपादकीय और प्रकाशन-केंद्र का है। इसका उद्देश्य भीड़-संचालन नहीं, बल्कि विचार-संरचना है; भावनात्मक उत्तेजना नहीं, बल्कि बौद्धिक स्पष्टता है। आज जब साहित्य के नाम पर वैचारिक अस्पष्टता, मिथ्या आरोपण और ऐतिहासिक भ्रम फैलाए जाते हैं, तब … आगे पढें

आंबेडकरवादी साहित्यकार किसे कहा जाए?

आंबेडकरवादी साहित्य के प्रसार के साथ एक प्रश्न बार-बार सामने आता है—आंबेडकरवादी साहित्यकार किसे माना जाए? और उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या ‘आंबेडकरवादी साहित्य’ पत्रिका या ‘आंबेडकरवादी साहित्य प्रकाशन’ से जुड़ाव आंबेडकरवादी साहित्यकार होने की शर्त है? ये प्रश्न केवल पहचान से जुड़े हुए नहीं हैं; ये सीधे-सीधे बौद्धिक स्वतंत्रता, वैचारिक … आगे पढें

आंबेडकरवादी साहित्य का मूल उद्देश्य

आंबेडकरवादी साहित्य किसी सामाजिक वर्ग, जाति या संख्यात्मक समूह की अभिव्यक्ति तक सीमित साहित्य नहीं है। यह एक मानवतावादी, विवेकशील और सामाजिक न्याय-आधारित वैचारिकी है, जिसका मूल उद्देश्य शोषण, असमानता और अन्याय से मुक्त एक समतामूलक समाज की रचना करना है। यह साहित्य मनुष्य को उसकी मानवीय गरिमा के साथ देखने की दृष्टि विकसित करता … आगे पढें