आंबेडकरवादी साहित्यकार किसे कहा जाए?

आंबेडकरवादी साहित्य के प्रसार के साथ एक प्रश्न बार-बार सामने आता है—आंबेडकरवादी साहित्यकार किसे माना जाए? और उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या ‘आंबेडकरवादी साहित्य’ पत्रिका या ‘आंबेडकरवादी साहित्य प्रकाशन’ से जुड़ाव आंबेडकरवादी साहित्यकार होने की शर्त है?

ये प्रश्न केवल पहचान से जुड़े हुए नहीं हैं; ये सीधे-सीधे बौद्धिक स्वतंत्रता, वैचारिक स्वायत्तता और साहित्य की प्रकृति को प्रभावित करते हैं। इसलिए इनका उत्तर भावनात्मक आग्रह के आधार पर नहीं, बल्कि सैद्धांतिक स्पष्टता के साथ दिया जाना चाहिए।

आंबेडकरवादी साहित्यकार की मूल पहचान

आंबेडकरवादी साहित्यकार की पहचान किसी संस्था, मंच या प्रकाशन से नहीं बनती। वह पहचान उसके लेखन की वैचारिक दिशा से बनती है। आंबेडकरवादी साहित्यकार वह है, जो—

• सामाजिक समता को केंद्रीय मूल्य मानता है।
• तर्क, विवेक और नैतिकता को लेखन का आधार बनाता है।
• जाति, असमानता और शोषण की संरचनाओं की आलोचना करता है।
• मनुष्य की गरिमा, स्वतंत्रता और अधिकारों को महत्व देता है।
• सामाजिक यथार्थ को आलोचनात्मक और प्रमाण-आधारित दृष्टि से देखता है।

यह पहचान किसी प्रमाण-पत्र से निर्धारित नहीं होती। लेखक का लेखन ही उसकी वैचारिक पहचान का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। डाॅ. आंबेडकर की बौद्धिक परंपरा में तर्क, विवेक और नैतिक परीक्षण को विशेष महत्व प्राप्त है। इसलिए किसी लेखक की वैचारिक पहचान का मूल्यांकन भी उसके विचार, तर्क और लेखन की दिशा के आधार पर होना चाहिए।

संस्था-आधारित पहचान का खतरा

जब यह धारणा बनने लगे कि “जो ‘आंबेडकरवादी साहित्य’ पत्रिका या प्रकाशन से जुड़ा है, वही आंबेडकरवादी साहित्यकार है”, तो यह साहित्य की स्वायत्त प्रकृति को सीमित करने वाली स्थिति होगी। ऐसी धारणा के कुछ गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

> पहला—विचार की स्वतंत्रता का ह्रास।
लेखक यह सोचने लग सकता है कि उसका लेखन किसी संस्था की अपेक्षाओं के अनुरूप है या नहीं।

> दूसरा—साहित्य का संकुचन।
विचारों की बहुलता और आलोचनात्मकता की जगह एकरूपता तथा अनुमोदन की प्रवृत्ति विकसित हो सकती है।

> तीसरा—अघोषित वैचारिक वर्चस्व।
कुछ मंच स्वयं को “मान्यता देने वाले” और अन्य लेखकों को “मान्यता प्राप्त करने वाले” की स्थिति में रख सकते हैं। यह साहित्य की स्वतंत्र प्रकृति के लिए स्वस्थ स्थिति नहीं है।

आंबेडकरवादी साहित्य की शक्ति इसी में है कि वह प्रश्न करता है, तर्क करता है और स्थापित धारणाओं की आलोचनात्मक समीक्षा करता है।

पत्रिका और प्रकाशन की वास्तविक भूमिका

किसी भी वैचारिक पत्रिका या प्रकाशन की अपनी स्पष्ट भूमिका होती है। उसका कार्य है—

साहित्यकारों और शोधकर्ताओं को मंच प्रदान करना,
गंभीर वैचारिक विमर्श को आगे बढ़ाना,
प्रकाशित सामग्री की गुणवत्ता का परीक्षण करना,
संपादकीय और समीक्षकीय अनुशासन बनाए रखना,
तथा प्रमाण, तर्क और वैचारिक स्पष्टता को महत्व देना।

लेकिन पत्रिका या प्रकाशन का कार्य किसी लेखक की स्थायी वैचारिक पहचान निर्धारित करना नहीं है। ‘आंबेडकरवादी साहित्य’ पत्रिका किसी लेखक को केवल इसलिए आंबेडकरवादी साहित्यकार घोषित नहीं करती कि उसका लेख प्रकाशित हुआ है। इसी प्रकार ‘आंबेडकरवादी साहित्य प्रकाशन’ से किसी लेखक की पुस्तक प्रकाशित हो जाने मात्र से उसकी वैचारिक पहचान का कोई प्रमाण-पत्र जारी नहीं हो जाता। प्रकाशन सहभागिता का माध्यम है, वैचारिक पहचान का प्रमाण-पत्र नहीं।

अनिवार्यता की बजाय विवेक

आंबेडकरवादी चिंतन में विचार की स्वीकृति का आधार विवेक, तर्क और नैतिक परीक्षण है। इसलिए किसी संस्था से जुड़ाव को आंबेडकरवादी साहित्यकार होने की अनिवार्य शर्त बना देना उचित नहीं है। यदि किसी लेखक से कहा जाए कि— “आंबेडकरवादी कहलाने के लिए अमुक मंच या प्रकाशन से जुड़ना आवश्यक है।” तो इससे साहित्य की स्वतंत्रता सीमित होती है और एक अनावश्यक संस्थागत निर्भरता पैदा होती है।

आंबेडकरवादी साहित्य का मूल स्वभाव स्वतंत्र, आलोचनात्मक और प्रश्नाकुल होना चाहिए। वह किसी भी प्रकार की बौद्धिक अधीनता को स्वीकार करने के बजाय तर्क और विवेक के आधार पर विचारों का परीक्षण करता है।

साहित्यकार और प्रकाशन का संबंध

किसी साहित्यकार का किसी पत्रिका या प्रकाशन से जुड़ना उसके साहित्यिक कार्य का एक पक्ष हो सकता है, उसकी संपूर्ण वैचारिक पहचान नहीं। एक लेखक अनेक पत्रिकाओं में लिख सकता है, विभिन्न प्रकाशनों से पुस्तकें प्रकाशित करा सकता है और अलग-अलग मंचों पर अपनी बात रख सकता है। इससे उसकी वैचारिक पहचान समाप्त या परिवर्तित नहीं हो जाती।

इसी प्रकार किसी लेखक की पुस्तक ‘आंबेडकरवादी साहित्य प्रकाशन’ से प्रकाशित होती है, तो इसका अर्थ यह है कि वह पुस्तक प्रकाशन की निर्धारित संपादकीय एवं समालोचनात्मक प्रक्रिया से गुजरकर प्रकाशित हुई है। इसका अर्थ यह नहीं कि प्रकाशन उस लेखक की ओर से कोई वैचारिक प्रमाण-पत्र जारी कर रहा है।

निष्कर्ष

आंबेडकरवादी साहित्यकार होने के लिए ‘आंबेडकरवादी साहित्य’ पत्रिका से जुड़ाव अनिवार्य नहीं है। ‘आंबेडकरवादी साहित्य प्रकाशन’ की मुहर आवश्यक नहीं है। किसी मंच या संस्था की स्वीकृति निर्णायक नहीं है। निर्णायक है—लेखन की वैचारिक दिशा, सामाजिक समता के प्रति प्रतिबद्धता, तर्क और विवेक का प्रयोग, तथा प्रश्न करने का साहस।

आंबेडकरवादी साहित्य किसी एक संस्था, पत्रिका या प्रकाशन की संपत्ति नहीं है। यह एक खुली बौद्धिक परंपरा है, जिसका मूल्य उसके विचार, तर्क, सामाजिक दृष्टि और मानवीय सरोकारों से निर्धारित होता है। यही इसकी स्वतंत्रता है और यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति भी।

— देवचंद्र भारती ‘प्रखर’
मुख्य संपादक, ‘आंबेडकरवादी साहित्य’ पत्रिका
प्रकाशक, आंबेडकरवादी साहित्य प्रकाशन

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