दलित, पददलित और महादलित की अवधारणा बनाम “हम दलित नहीं”

भारतीय समाज में वंचित समुदायों की पहचान को लेकर अनेक शब्द प्रचलित हुए हैं। इनमें “पददलित”, “दलित” और “महादलित” प्रमुख हैं। इन शब्दों को सामान्यतः सामाजिक न्याय, प्रतिरोध और मुक्ति की राजनीति से जोड़कर देखा जाता है। किंतु किसी भी अवधारणा का मूल्यांकन केवल उसके ऐतिहासिक उपयोग से नहीं, बल्कि उसके वैचारिक परिणामों से किया … आगे पढें

संत रविदास के काव्य में बौद्ध चिंतन

संतकवि रविदास जी के जीवन परिचय और उनकी विचारधारा के विषय में विद्वानों में पर्याप्त मतभेद है । हिंदू विद्वान उन्हें एक हिंदू भक्त के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जबकि बौद्ध विद्वान उन्हें बौद्ध विरासत का पुरोधा कहते हैं । संत रविदास जी के पंथ का अनुसरण करने वाले लोग उनके नाम पर ‘रविदासिया … आगे पढें

आंबेडकरवाद : दिशा एवं दृष्टि 

आंबेडकरवाद के संदर्भ में भ्रमित लोगों के भ्रम-निवारण हेतु ही ‘आंबेडकरवादी साहित्य’ पत्रिका के इस तृतीय अंक का विषय ‘आंबेडकरवाद : दिशा एवं दृष्टि’ रखा गया है । आंबेडकरवाद को सम्यक रूप में समझने के लिए सर्वप्रथम ‘वाद’ का आशय समझना अनिवार्य है । शब्दकोश के अनुसार ‘वाद’ का अर्थ है, “वह दार्शनिक सिद्धांत, जिसके … आगे पढें

अस्पृश्यता, जातिगत भेदभाव, डॉ० आंबेडकर और बौद्ध धम्म

हजारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा । अल्लामा इक़बाल के इस शेर का वाच्यार्थ यह है कि अपनी सुंदरता से अनजान नरगिस (एक प्रकार का फूल) हजारों सालों तक अपनी बेनूरी (अंधेपन) पर रोती रहती है कि मुझमें कोई गुण, आकर्षण या सुन्दरता नहीं … आगे पढें

आंबेडकरवादी कहानी की सम्यक परंपरा

लीक-लीक गाड़ी चले, लीकहिं चले कपूत । लीक छाँड़ि तीनों चलें, शायर सिंह सपूत ।। भारतेंदु हरिश्चंद्र जी का उक्त दोहा परंपरा का अंधानुकरण न करने की सीख देता है । ध्यातव्य है कि न तो हर पुरानी परंपरा गलत होती है और न ही हर नयी परंपरा सही होती है । क्योंकि नयी परंपरा … आगे पढें

आंबेडकरवादी साहित्य : प्रतिरोध नहीं, पुनर्रचना का अनुशासन

समय का सबसे बड़ा संकट यह है कि विचार की जगह प्रतीक ने ले ली है। डॉ. आंबेडकर का नाम सर्वत्र उच्चारित हो रहा है, परंतु उनका दर्शन उसी अनुपात में अनुपस्थित है। चित्रों और नारों की बहुलता ने अध्ययन और चिंतन की गंभीरता को प्रतिस्थापित कर दिया है। भीमराव रामजी आंबेडकर ने जिस सामाजिक … आगे पढें

आडंबर-मिशन पुस्तक | आंबेडकरवादी साहित्य प्रकाशन

आडंबर-मिशन (समसामयिक समाज पर आंबेडकरवादी आलोचनात्मक विश्लेषण) देवचंद्र भारती ‘प्रखर’ का निबंध-संग्रह है। पुस्तक का केंद्र आंबेडकर-मिशन की वह स्थिति है, जहाँ विचार और आचरण के बीच का अंतर लगातार बढ़ता दिखाई देता है। आंबेडकर के नाम का सार्वजनिक जीवन में जितना विस्तार हुआ है, क्या उसी अनुपात में उनके विचारों की समझ और प्रतिबद्धता … आगे पढें

धम्म-चर्चा पुस्तक | आंबेडकरवादी साहित्य प्रकाशन

धम्म-चर्चा धम्म को केवल धार्मिक अवधारणा के रूप में देखने के बजाय उसके सामाजिक, नैतिक और व्यावहारिक पक्षों को समझने की दिशा में ले जाने वाली वैचारिक पुस्तक है। इसमें धम्म से जुड़े उन प्रश्नों पर विचार किया गया है, जिन्हें प्रायः रूढ़ धारणाओं और पूर्वनिर्धारित मान्यताओं के कारण ठीक से समझा नहीं जाता। पुस्तक … आगे पढें