भारतीय सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में कुछ ऐसे शब्द प्रचलित हुए हैं, जिनका आकर्षण उनके वास्तविक अर्थ से अधिक होता है। ऐसे शब्द सुनने में व्यापक, न्यायपूर्ण और जनपक्षीय प्रतीत होते हैं। किंतु जब उनके अर्थ और उनके प्रयोग की गंभीर समीक्षा की जाती है, तो उनके भीतर छिपे हुए अनेक अंतर्विरोध सामने आते हैं। ‘बहुजन’ ऐसा ही एक शब्द है। आज यह शब्द राजनीति, समाज, संस्कृति और साहित्य—सभी क्षेत्रों में बार-बार प्रयुक्त किया जाता है। ‘बहुजन समाज’, ‘बहुजन राजनीति’, ‘बहुजन संस्कृति’, ‘बहुजन साहित्य’ जैसे शब्द आज सामान्य राजनीतिक और वैचारिक शब्दावली का हिस्सा बन चुके हैं। किंतु प्रश्न यह है कि ‘बहुजन’ शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है और उसका आधुनिक प्रयोग किस प्रकार का वैचारिक परिणाम उत्पन्न करता है। इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि ‘बहुजन’ शब्द का मूल संदर्भ क्या था।
बुद्ध का ‘बहुजन’: व्यापक मानवता
बौद्ध परंपरा में “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” का सिद्धांत अत्यंत प्रसिद्ध है। तथागत बुद्ध ने अपने धम्म के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए यह कहा कि उनका धम्म “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” है। इस वाक्य का अर्थ अक्सर गलत समझ लिया जाता है। इसका अर्थ यह नहीं था कि धम्म किसी विशेष सामाजिक वर्ग या समूह के लिए है। इसका अर्थ था—बहुत अधिक लोगों के हित और सुख के लिए धम्म का मार्ग प्रस्तुत किया गया है। तथागत बुद्ध का यह कथन एक व्यावहारिक सत्य को स्वीकार करता है। संसार में कोई भी सिद्धांत, नियम या व्यवस्था ऐसी नहीं हो सकती, जो सभी लोगों के हित में समान रूप से कार्य करे। समाज में सदैव विभिन्न प्रकार के लोग होते हैं—सज्जन भी और दुष्ट भी। कोई भी नैतिक सिद्धांत उन लोगों के हित में नहीं हो सकता जो हिंसा, छल और अन्याय को अपना स्वभाव बना लेते हैं। इसलिए बुद्ध ने यह कहा कि धम्म का उद्देश्य ‘बहुजन’ अर्थात् अधिक से अधिक लोगों के हित और सुख को सुनिश्चित करना है।
यहाँ ‘बहुजन’ शब्द का संबंध किसी जाति, वर्ग, लिंग या समुदाय से नहीं था। बुद्ध के धम्म में मनुष्य की पहचान उसके जन्म से नहीं, बल्कि उसके कर्म और आचरण से होती है। बुद्ध का चिंतन सार्वभौमिक था। उसमें जाति, वर्ण, वर्ग या लिंग के आधार पर कोई विभाजन नहीं था। बुद्ध का धम्म मनुष्य को मनुष्य के रूप में देखता है। इसलिए ‘बहुजन’ शब्द का अर्थ भी उसी व्यापक मानवीय संदर्भ में था।
आधुनिक राजनीति में ‘बहुजन’
आधुनिक भारतीय राजनीति में ‘बहुजन’ शब्द का प्रयोग एक विशेष राजनीतिक संदर्भ में सामने आया। इस प्रयोग का उद्देश्य विभिन्न जातीय समूहों को एक व्यापक राजनीतिक पहचान के अंतर्गत संगठित करना था। यहाँ ‘बहुजन’ शब्द का अर्थ मानवता की व्यापकता नहीं रहा, बल्कि कुछ विशेष सामाजिक वर्गों के सामूहिक नाम के रूप में निर्धारित किया गया। इस प्रकार यह शब्द धीरे-धीरे एक राजनीतिक नारे में परिवर्तित हो गया।
राजनीति में शब्दों का चयन केवल भाषा का प्रश्न नहीं होता। शब्दों के माध्यम से ही राजनीतिक पहचान और वैचारिक ढाँचे निर्मित किए जाते हैं। ‘बहुजन’ शब्द का राजनीतिक उपयोग भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा था। इस शब्द के माध्यम से यह धारणा स्थापित करने का प्रयास किया गया कि समाज का एक बड़ा हिस्सा एक समान राजनीतिक पहचान रखता है। इस प्रकार ‘बहुजन’ शब्द एक वैचारिक अवधारणा से अधिक एक चुनावी रणनीति का उपकरण बन गया। यहीं से इस शब्द का वास्तविक अर्थ बदलने लगता है। जहाँ बुद्ध के चिंतन में ‘बहुजन’ मानवता का प्रतीक था, वहीं आधुनिक राजनीति में यह एक विशेष सामाजिक समूह की पहचान बन गया।
बहुजन राजनीति : संख्या की राजनीति
‘बहुजन राजनीति’ शब्द भी व्यापक रूप से प्रयोग किया जाता है। यह राजनीति मूलतः संख्या के आधार पर शक्ति प्राप्त करने की रणनीति पर आधारित होती है। इस राजनीति का उद्देश्य विभिन्न जातियों को एक राजनीतिक समूह के रूप में संगठित करना होता है। यह प्रक्रिया मूलतः जातीय चेतना पर आधारित होती है। संख्या की राजनीति का स्वभाव यह होता है कि वह समाज को विभिन्न समूहों में विभाजित करती है। लोकतंत्र का उद्देश्य समाज को जोड़ना होता है, किंतु जब राजनीति केवल संख्या के आधार पर संचालित होने लगती है, तो वह समाज को विभाजित भी करती है।
तथागत बुद्ध बनाम बहुजन राजनीति
यदि तथागत बुद्ध के ‘बहुजन’ और आधुनिक राजनीति के ‘बहुजन’ की तुलना की जाए, तो दोनों के बीच मूलभूत अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। बुद्ध का ‘बहुजन’ मानवता की व्यापकता का प्रतीक है। उसमें किसी प्रकार की जातीय पहचान या राजनीतिक रणनीति का स्थान नहीं है। बुद्ध का धम्म नैतिकता, करुणा और समता पर आधारित है। इसके विपरीत आधुनिक राजनीति का ‘बहुजन’ एक राजनीतिक नारा है। इसका उद्देश्य समाज के कुछ समूहों को एक राजनीतिक पहचान के अंतर्गत संगठित करना है। इस प्रकार बुद्ध का ‘बहुजन’ मानवतावादी अवधारणा है, जबकि आधुनिक राजनीति का ‘बहुजन’ जातीय और राजनीतिक अवधारणा बन गया है।
‘बहुजन समाज’ : भ्रमपूर्ण शब्द
‘बहुजन समाज’ शब्द का प्रयोग आज बहुत सामान्य हो गया है। यह शब्द सुनने में ऐसा प्रतीत होता है, जैसे यह पूरे समाज का प्रतिनिधित्व करता हो। किंतु वास्तविकता यह है कि इस शब्द का प्रयोग समाज के कुछ विशेष समूहों के लिए किया जाता है। समाज की वास्तविक संरचना अत्यंत जटिल होती है। उसमें अनेक प्रकार की पहचानें, अनुभव और परंपराएँ मौजूद होती हैं। समाज को केवल एक शब्द में सीमित कर देना वैचारिक सरलीकरण है। ‘बहुजन समाज’ शब्द समाज की वास्तविक विविधता को अनदेखा करता है और उसे एक राजनीतिक पहचान में बदल देता है। इतना ही नहीं, जिस तथाकथित ‘बहुजन समाज’ की बात की जाती है, उसके भीतर ही अनेक राजनीतिक दल मौजूद हैं। यदि वास्तव में कोई एक संगठित ‘बहुजन समाज’ होता, तो उसके राजनीतिक स्वरूप में इतनी विविधता और परस्पर विरोध क्यों दिखाई देता?
बहुजन संस्कृति : संकीर्ण पहचान
संस्कृति किसी एक वर्ग या समूह की नहीं होती। वह समाज के दीर्घकालीन अनुभवों, परंपराओं और जीवन-प्रक्रियाओं से निर्मित होती है। जब संस्कृति को किसी विशेष पहचान के अंतर्गत सीमित किया जाता है, तो उसका स्वाभाविक स्वरूप प्रभावित होता है। ‘बहुजन संस्कृति’ शब्द भी इसी प्रकार की संकीर्णता को जन्म देता है। संस्कृति का स्वभाव समावेशी होता है। वह समाज के विभिन्न अनुभवों को समाहित करती है। इसलिए उसे किसी एक पहचान के अंतर्गत सीमित करना उचित नहीं है।
बहुजन साहित्य : एक हास्यास्पद अवधारणा
बहुजन शब्द का प्रयोग साहित्य में भी किया जाने लगा है। ‘बहुजन साहित्य’ के अंतर्गत विभिन्न विधाओं के नाम इस प्रकार होंगे, यथा—’बहुजन कविता’, ‘बहुजन कहानी’, ‘बहुजन नाटक’, ‘बहुजन निबंध’, ‘बहुजन आत्मकथा’, ‘बहुजन उपन्यास’, ‘बहुजन संस्मरण’, ‘बहुजन जीवनी’ आदि। पहली दृष्टि में यह शब्द सुनने में आकर्षक लग सकते हैं, किंतु जब इन पर गंभीरता से विचार किया जाता है, तो ‘बहुजन साहित्य’ की अवधारणा अत्यंत हास्यास्पद और निरर्थक सिद्ध होती है। क्योंकि—
- आत्मकथा होगी एक व्यक्ति की और नाम होगा—’बहुजन आत्मकथा’।
- जीवनी होगी एक व्यक्ति की और नाम होगा—’बहुजन जीवनी’।
- संस्मरण होगा एक व्यक्ति का और नाम होगा—’बहुजन संस्मरण’।
- कहानी होगी किसी एक पात्र की और नाम होगा—’बहुजन कहानी’।
इस प्रकार बहुजन कविता, बहुजन कहानी, बहुजन नाटक, बहुजन निबंध, बहुजन आत्मकथा, बहुजन उपन्यास, बहुजन संस्मरण, बहुजन जीवनी— इन शब्दों का प्रयोग करना साहित्यिक अज्ञानता की पहचान है। यह स्थिति बताती है कि ‘बहुजन साहित्य’ जैसी अवधारणा साहित्यिक दृष्टि से बिल्कुल असंगत है। साहित्य का संबंध मनुष्य की संवेदना और अनुभव से होता है, न कि किसी संख्या या समूह की पहचान से। बहुजन साहित्य की अवधारणा प्रस्तुत करने वाले लोग अनपढ़ों से भी गये-गुजरे हैं।
भ्रमजाल की पहचान
‘बहुजन समाज’, ‘बहुजन राजनीति’, ‘बहुजन संस्कृति’ और ‘बहुजन साहित्य’— ये सभी शब्द वैचारिक भ्रमजाल का निर्माण करते हैं। ये शब्द सुनने में व्यापकता का संकेत देते हैं, किंतु व्यवहार में ये समाज को नई पहचान आधारित श्रेणियों में विभाजित करते हैं। यदि समाज को वास्तविक समानता और न्याय की दिशा में आगे बढ़ना है, तो उसे ऐसे शब्दों के आकर्षण से अधिक उनके वास्तविक अर्थ और प्रभाव को समझना होगा।
आंबेडकरवादी दृष्टि और ‘बहुजन‘ की समस्या
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सामाजिक परिवर्तन का आधार व्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को माना। उनका चिंतन किसी भी प्रकार की जातीय पहचान पर आधारित राजनीतिक समूह निर्माण का समर्थन नहीं करता। आंबेडकर का लक्ष्य जाति का उच्छेद था, न कि जातियों को जोड़कर नई राजनीतिक पहचान बनाना। इस दृष्टि से ‘बहुजन’ की आधुनिक राजनीतिक अवधारणा आंबेडकरवादी चिंतन से मेल नहीं खाती। जब राजनीति जातियों को जोड़कर एक नया समूह बनाने का प्रयास करती है, तब वह जाति की संरचना को समाप्त नहीं करती, बल्कि उसे एक नए रूप में बनाए रखती है।
आंबेडकरवादी दृष्टि का लक्ष्य यह है कि समाज में व्यक्ति की पहचान उसके जन्म से नहीं, बल्कि उसके मानवाधिकारों और नागरिकता से निर्धारित हो। इसलिए जातीय समूहों पर आधारित राजनीतिक अवधारणाएँ सामाजिक परिवर्तन के वास्तविक लक्ष्य को धुंधला कर देती हैं।
निष्कर्ष
अंततः यह स्पष्ट होता है कि बुद्ध का ‘बहुजन’ और आधुनिक राजनीति का ‘बहुजन’ दो बिल्कुल भिन्न अवधारणाएँ हैं। बुद्ध का ‘बहुजन’ मानवता की व्यापकता का प्रतीक था, जबकि आधुनिक राजनीतिक प्रयोग में यह शब्द एक सीमित सामाजिक पहचान बन गया है। इसी कारण ‘बहुजन समाज’, ‘बहुजन राजनीति’, ‘बहुजन संस्कृति’ और ‘बहुजन साहित्य’ जैसे शब्द वैचारिक स्पष्टता के स्थान पर भ्रम उत्पन्न करते हैं। साहित्य, संस्कृति और समाज की वास्तविक समझ इन शब्दों के प्रयोग से नहीं, बल्कि मानवीय समानता और नैतिक चेतना से विकसित होती है। इस दृष्टि से यह कहना अनुचित नहीं होगा कि ‘बहुजन’ शब्द का आधुनिक प्रयोग एक वैचारिक भ्रमजाल है, जो वास्तविक सामाजिक प्रश्नों को स्पष्ट करने की बजाय उन्हें और अधिक उलझा देता है।