समय का सबसे बड़ा संकट यह है कि विचार की जगह प्रतीक ने ले ली है। डॉ. आंबेडकर का नाम सर्वत्र उच्चारित हो रहा है, परंतु उनका दर्शन उसी अनुपात में अनुपस्थित है। चित्रों और नारों की बहुलता ने अध्ययन और चिंतन की गंभीरता को प्रतिस्थापित कर दिया है। भीमराव रामजी आंबेडकर ने जिस सामाजिक क्रांति की परिकल्पना की, वह भावनात्मक उत्तेजना पर आधारित नहीं थी। वह विश्लेषण पर आधारित थी। जाति का उच्छेद एक नैतिक घोषणा नहीं, एक तार्किक अनिवार्यता था। संविधान केवल विधिक दस्तावेज नहीं, सामाजिक पुनर्रचना की रूपरेखा था। धम्म-दीक्षा केवल धार्मिक परिवर्तन नहीं, नैतिक और बौद्धिक पुनर्संयोजन था।
आंबेडकरवादी साहित्य उसी पुनर्संयोजन का साहित्यिक रूप है। स्पष्ट घोषणा आवश्यक है—
• आंबेडकरवादी साहित्य करुणा-प्रधान भावुक लेखन नहीं है।
• यह आक्रोश की असंयमित भाषा भी नहीं है।
• यह पहचान-आधारित उत्सवधर्मिता नहीं है।
• यह पौराणिक प्रतिशोध की परियोजना नहीं है।
यह सामाजिक संरचना का तर्कपूर्ण विश्लेषण और उसके परिवर्तन का वैचारिक अनुशासन है।
आंबेडकर का अंतिम बौद्धिक संकल्प गौतम बुद्ध के धम्म में निहित था। यह धम्म आस्था से अधिक प्रज्ञा का आग्रह करता है। यह करुणा को नैतिकता से जोड़ता है और समता को सामाजिक व्यवहार में परिणत करता है। आंबेडकरवादी साहित्य इसी प्रज्ञा, इसी नैतिकता और इसी समता को अपनी आधारभूमि बनाता है। आज साहित्य के सामने दो रास्ते हैं—पहला, प्रतीकों की भीड़ में शामिल होकर आत्मसंतोष प्राप्त करना। दूसरा, विचार की कठिन राह स्वीकार करना। आंबेडकरवादी साहित्य दूसरा मार्ग चुनता है।
इस अंक का उद्देश्य विमर्श को दिशा देना है। यहाँ सैद्धांतिक प्रतिमान की स्थापना का आग्रह है। यहाँ यह स्पष्ट किया गया है कि आंबेडकरवादी साहित्य का मूल्यांकन किन मानदंडों पर होगा—तर्कवाद, संवैधानिक नैतिकता, जाति-निरसन दृष्टि, सामाजिक पुनर्रचना और बौद्ध-मानवतावाद। जब तक साहित्य स्वयं अपने मानक निर्धारित नहीं करता, तब तक वह या तो राजनीतिक उपभोग का साधन बनता है या भावनात्मक आवेग का माध्यम। आंबेडकरवादी साहित्य इन दोनों स्थितियों को अस्वीकार करता है।
• यह साहित्य विरोध का शोर नहीं; परिवर्तन की संरचना है।
• यह साहित्य स्मृति का संग्रह नहीं; भविष्य की रूपरेखा है।
• यह साहित्य प्रतीक की सजावट नहीं; विचार का अनुशासन है।
वर्तमान में, यह स्पष्ट कहना आवश्यक है—आंबेडकरवादी साहित्य भारतीय साहित्य की परिधि पर नहीं, उसकी नैतिक धुरी पर स्थित है।
— देवचंद्र भारती ‘प्रखर’