आंबेडकरवादी साहित्य को नकारने की चालें और उसका वैचारिक जवाब

दलित साहित्य के कुछ समर्थक पूछते हैं कि दलित साहित्य पर अनेक शोधकार्य हुये हैं, आंबेडकरवादी साहित्य पर कितने शोधकार्य हुये हैं? यानी वे आंबेडकरवादी साहित्य की अवधारणा को नकारते हैं। इसके प्रत्युत्तर में यह लेख प्रस्तुत है। शोध की संख्या से विचारधारा का अस्तित्व तय नहीं होता किसी साहित्यिक अवधारणा की वैधता शोध-प्रबंधों की … आगे पढें

पूर्व-आंबेडकरवादी चेतना साहित्य : आंबेडकरवादी विचारधारा का ऐतिहासिक आधार

समकालीन आंबेडकरवादी साहित्य विमर्श में एक महत्वपूर्ण प्रश्न लगातार उभरता है—डॉ. भीमराव आंबेडकर से पूर्व SC-ST-OBC के साहित्यकारों द्वारा रचित साहित्य को किस श्रेणी में रखा जाए? क्या उसे आंबेडकरवादी साहित्य कहा जाए या उससे पृथक किसी स्वतंत्र परंपरा के रूप में देखा जाए? यह प्रश्न केवल नामकरण का नहीं, बल्कि वैचारिक अनुशासन, ऐतिहासिक विवेक … आगे पढें

दलित साहित्य बनाम आंबेडकरवादी साहित्य : नामकरण नहीं, वैचारिक उत्तरदायित्व का प्रश्न

समकालीन हिंदी साहित्य में “दलित साहित्य” शब्द एक स्थापित पहचान बन चुका है। किंतु इसी के समानांतर “आंबेडकरवादी साहित्य” की अवधारणा अब भी अस्पष्ट, उपेक्षित और अक्सर भ्रमित की गयी श्रेणी बनी हुई है। अनेक लेखक स्वयं को दलित साहित्यकार कहते हैं, डॉ. आंबेडकर का संदर्भ लेते हैं, किंतु न तो वे आंबेडकरवादी वैचारिक परंपरा … आगे पढें

डॉ. आंबेडकर का लेखन और आंबेडकरवादी साहित्य : मूल स्रोत और वैचारिक परंपरा का अंतर्संबंध

आंबेडकरवादी साहित्य की अवधारणा पर विमर्श करते समय प्रायः यह प्रश्न उठता है कि डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा लिखित ग्रंथों को आंबेडकरवादी साहित्य की श्रेणी में रखा जाए या नहीं। यह लेख तर्क करता है कि डॉ. आंबेडकर का लेखन स्वयं आंबेडकरवादी साहित्य नहीं, बल्कि उसका वैचारिक आधार और मूल स्रोत है। आंबेडकरवादी साहित्य एक … आगे पढें

आई.एस.एस.एन.: संरचना, मानक और संपादकीय उत्तरदायित्व

किसी भी वैचारिक अथवा शोधपरक पत्रिका की पहचान केवल उसके वैचारिक रुझान या प्रकाशित सामग्री तक सीमित नहीं होती। आधुनिक अकादमिक व्यवस्था में पत्रिका की संस्थागत विश्वसनीयता, अभिलेखीय उपस्थिति और अंतरराष्ट्रीय मान्यता के लिए कुछ तकनीकी मानकों का पालन अनिवार्य है। इन्हीं मानकों में आई.एस.एस.एन. (International Standard Serial Number) का विशेष स्थान है। यह केवल … आगे पढें

आंबेडकरवादी साहित्य की दलित साहित्य से भिन्नता – एक आवश्यक स्पष्टीकरण

आंबेडकरवादी साहित्य को प्रायः दलित साहित्य के समान समझ लिया जाता है। यह समानता देखने में सहज लग सकती है, किंतु वैचारिक दृष्टि से यह भ्रमपूर्ण और अपूर्ण समझ है। दोनों साहित्यिक प्रवृत्तियों के बीच कुछ साझा सरोकार अवश्य हैं, पर उनकी दृष्टि, उद्देश्य और पद्धति में मूलभूत अंतर है। यह लेख दोनों साहित्यिक धाराओं … आगे पढें

आंबेडकरवादी साहित्य का मूल उद्देश्य

आंबेडकरवादी साहित्य किसी सामाजिक वर्ग, जाति या संख्यात्मक समूह की अभिव्यक्ति तक सीमित साहित्य नहीं है। यह एक मानवतावादी, विवेकशील और सामाजिक न्याय-आधारित वैचारिकी है, जिसका मूल उद्देश्य शोषण, असमानता और अन्याय से मुक्त एक समतामूलक समाज की रचना करना है। यह साहित्य मनुष्य को उसकी मानवीय गरिमा के साथ देखने की दृष्टि विकसित करता … आगे पढें

आंबेडकरवादी साहित्य की प्रकृति : एक बहु-विधात्मक वैचारिक चेतना

आंबेडकरवादी साहित्य को किसी एक विधा, शैली या अभिव्यक्ति-रूप में सीमित करना उसके मूल स्वभाव के साथ अन्याय होगा। यह साहित्य न तो केवल कविता है, न मात्र आलोचना, और न ही किसी एक सामाजिक वर्ग की भावनात्मक अभिव्यक्ति। वस्तुतः आंबेडकरवादी साहित्य एक बहु-विधात्मक साहित्यिक चेतना है, जिसका मूल लक्ष्य समाज की असमान संरचनाओं का … आगे पढें