यह एक संपादकीय लेख है, जो ‘आंबेडकरवादी साहित्य’ पत्रिका के खंड 5, अंक 1 | जनवरी-मार्च 2025 में प्रकाशित है। मूल लेख यहाँ प्रस्तुत है।

‘नमो बुद्धाय – जय भीम’ अभिवादन का अभिप्राय

— देवचंद्र भारती ‘प्रखर’
संपादक, 'आंबेडकरवादी साहित्य' पत्रिका

आंबेडकरवादी लोग आपस में अभिवादन के रूप में प्रायः ‘नमो बुद्धाय – जय भीम’ शब्द का प्रयोग करते हैं। इस अभिवादन को सुनकर कुछ लोग आपत्ति करते हैं और यह तर्क देते हैं कि अभिवादन के रूप में केवल बुद्ध और आंबेडकर का स्मरण करना उचित नहीं है। ऐसे लोग अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा-वर्ग में जन्मे हुए सभी महापुरुषों का स्मरण करने की बात करते हैं। लेकिन उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं है कि ‘नमो बुद्धाय’ और ‘जय भीम’ के बीच में योजक चिन्ह (-) है। इसका अभिप्राय यह है कि ‘नमो बुद्धाय’ और ‘जय भीम’ के बीच में एक लंबी श्रृंखला है, जो बुद्धयुग और आंबेडकरयुग को जोड़ती है। अतः इन दोनों युगों के मध्य में जन्म लेने वाले सभी सन्मार्गी महापुरुषों के नाम स्वतः इस श्रृंखला में सम्मिलित हो जाते हैं। उन सन्मार्गी महापुरुषों के नाम हैं – संत कबीर, संत रविदास, ज्योतिराव फुले, सावित्रीबाई फुले, नारायण गुरु, छत्रपति शाहूजी महाराज, बिरसा मुंडा, संत गाडगे और पेरियार रामास्वामी । जब कोई आंबेडकरवादी व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को ‘नमो बुद्धाय – जय भीम’ कहकर अभिवादन करता है, तो वह केवल तथागत बुद्ध को नमन और डॉ. आंबेडकर की जयकार नहीं करता है। बल्कि वह व्यक्ति ‘नमो बुद्धाय – जय भीम’ की श्रृंखला के बीच में सम्मिलित होने वाले सभी सन्मार्गी महापुरुषों को नमन करते हुए उनकी जयकार करता है।

कुछ आंबेडकरवादी लोग अभिवादन के रूप में ‘नमो बुद्धाय – जय भीम’ शब्द के स्थान पर ‘जय भीम – नमो बुद्धाय’ शब्द का प्रयोग करते हैं। उन लोगों का यह तर्क है कि बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने बौद्ध धम्म को पुनर्जीवित किया और तथागत बुद्ध के सम्यक चरित्र से भारतवासियों को परिचित कराया। अतः बाबा साहेब का नाम पहले लिया जाना चाहिए और बुद्ध का नाम बाद में। इसलिए वे लोग पहले डॉ. आंबेडकर की जयकार करते हैं, उसके बाद तथागत बुद्ध को नमन करते हैं। लेकिन उन्हें इस बात का ध्यान नहीं है कि गुरु तो गुरु ही होता है। यदि शिष्य लोगों को अपने गुरु का परिचय दे, तो इससे उसका स्थान गुरु से ऊंचा नहीं हो जाएगा। बाबा साहेब ने भले ही तथागत बुद्ध से लोगों को परिचित कराया और बौद्ध धम्म को पुनर्जीवित किया, लेकिन वे तथागत बुद्ध को अपना गुरु मानते थे। अतः गुरु (बुद्ध) को नमन पहले किया जाना चाहिए और शिष्य (डाॅ. आंबेडकर) की जयकार बाद में। ऐसा करना बाबा साहेब के प्रति सम्मान भावना का सूचक है। क्योंकि गुरु के सम्मान में ही शिष्य का सम्मान है।

आजकल कुछ बौद्ध लोग अभिवादन के रूप में केवल ‘नमो बुद्धाय’ शब्द का प्रयोग करते हैं। उन्हें ‘जय भीम’ शब्द का प्रयोग करना स्वीकार नहीं है। उनका कहना है कि ‘जय भीम’ शब्द का बौद्ध संस्कार से कोई संबंध नहीं है। बौद्ध व्यक्ति के लिए ‘नमो बुद्धाय’ शब्द ही पर्याप्त है। ऐसे लोग स्वयं को शाक्यवंशी कहते हैं। वे डॉ. आंबेडकर के स्थान पर सम्राट अशोक की जयकार करना उचित समझते हैं। क्योंकि उनके अनुसार सम्राट अशोक का संबंध उनके वंश से हैं। इस प्रकार के तर्कों से उन तथाकथित बौद्धों की जातीय मानसिकता प्रकट हो जाती है। क्योंकि बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर जातिगत रूप से महार थे, जो अनुसूचित जाति की श्रेणी में है। विडंबना यह है कि इक्कीसवीं सदी में भी समता की बात करने वाले पिछड़े-वर्ग के लोग अनुसूचित जाति से अपने आपको श्रेष्ठ समझते हैं। यही कारण है कि प्रायः ऐसे लोग अनुसूचित जाति के महापुरुषों और वर्तमान में सक्रिय विद्वान/सामाजिक लोगों के प्रति हीन भावना रखते हैं। वे लोग अपने मुख से बाबा साहेब का नाम लेना पसंद नहीं करते हैं। अतः वे ‘जय भीम’ नहीं कहते हैं। ऐसे लोग यदि राजनीति के क्षेत्र में ‘जय भीम’ कहकर अभिवादन कर भी दें, तो उसका कोई औचित्य नहीं है। क्योंकि राजनीति में तो राजनेता कुछ भी कर सकते हैं।

निष्कर्ष रूप में यह स्पष्ट है कि आंबेडकरवादी लोगों के लिए ‘नमो बुद्धाय – जय भीम’ कहकर अभिवादन करना ही सर्वथा उचित है। इस अभिवादन में अनेक महापुरुषों के नाम छिपे हुए हैं। जिस प्रकार व्याख्या लिखने के लिए किसी गद्यांश अथवा पद्यांश को संक्षेप में लिखा जाता है तथा प्रारंभिक और अंतिम शब्दों के बीच में डाॅट डाॅट डाॅट (…) लिखा जाता है, ठीक उसी प्रकार ‘नमो बुद्धाय – जय भीम’ शब्द एक संक्षिप्त वाक्यांश के समान है, जिसकी व्याख्या बहुत विस्तृत है। इस बारे में किसी भी बौद्ध आंबेडकरवादी व्यक्ति को तनिक भी भ्रम नहीं होना चाहिए। शब्दगत और अर्थगत दोनों दृष्टियों से ‘नमो बुद्धाय – जय भीम’ शब्द ही सर्वोत्तम है।

आंबेडकरवादी साहित्य पत्रिका के इस अंक में डॉ. बी.आर. बुद्धप्रिय, डॉ. राम मनोहर राव, देवचंद्र भारती ‘प्रखर’ के शोध-पत्र एवं डॉ. सूरजमल सितम, ज्ञानेंद्र प्रसाद, श्यामलाल राही के लेख सम्मिलित हैं। साथ ही डॉ. राम मनोहर राव द्वारा लिखित संस्मरण और उपन्यासकार श्यामलाल राही द्वारा लिखित उपन्यास ‘अच्युत नाग’ का अंश भी संकलित हैं। डॉ. राजवीर सिंह कमल द्वारा महाकवि एल.एन. सुधाकर जी के काव्य-संग्रह ‘उत्पीड़न की यात्रा’ पुस्तक की समीक्षा को भी इस अंक में स्थान दिया गया है। इसके अतिरिक्त रघुबीर सिंह ‘नाहर’, मनोहर लाल प्रेमी और रामकिशोर आनंद आदि कवियों की कविताओं को भी संकलित किया गया है। पूर्व अंकों की भांति यह अंक भी आंबेडकरवादी साहित्य के पाठकों, प्राध्यापकों एवं शोधार्थियों के लिए अवश्य उपयोगी सिद्ध होगा।