आंबेडकरवादी साहित्य : अवधारणा, सीमा और प्रतिमान | आंबेडकरवादी विमर्श

1. प्रस्तावना समकालीन हिंदी साहित्य में “आंबेडकरवादी साहित्य” एक प्रचलित पद बन चुका है, किंतु प्रचलन और सिद्धांत समान नहीं होते। किसी भी साहित्यिक धारा की स्थिरता उसके नाम में नहीं, उसकी वैचारिक स्पष्टता में होती है। यदि अवधारणा अस्पष्ट रहे, तो विमर्श भावनात्मक प्रतिक्रियाओं और आंशिक व्याख्याओं में बिखर जाता है। आंबेडकरवादी साहित्य को … आगे पढें