आंबेडकरवाद : दलित-विमर्श से व्यापक वैचारिक परियोजना

आंबेडकरवाद को केवल दलित-विमर्श तक सीमित कर देना उसके व्यापक दार्शनिक और सामाजिक आयामों को संकुचित कर देना है। यह सत्य है कि जाति-आधारित उत्पीड़न उसके चिंतन का ऐतिहासिक संदर्भ रहा, किंतु उसका अंतिम लक्ष्य पीड़ित-अस्मिता की स्थायी स्थापना नहीं, बल्कि मनुष्य की गरिमा की सार्वभौमिक पुनर्स्थापना है। आंबेडकरवाद पहचान-राजनीति की सीमाओं से आगे बढ़कर … आगे पढें

आंबेडकरवादी साहित्य और विद्वत्-मंडल की आवश्यकता

1. प्रस्तावना: साहित्य और वैचारिक अनुशासन आंबेडकरवादी साहित्य केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति या सामाजिक प्रतिक्रिया का क्षेत्र नहीं है। यह एक वैचारिक अनुशासन है, जो इतिहास, तर्क और प्रमाण पर आधारित है। यदि इस क्षेत्र में बौद्धिक संतुलन न रहे, तो साहित्य प्रतिक्रियात्मक तो रह सकता है, पर दिशात्मक नहीं। इसी बिंदु पर एक स्थायी बौद्धिक … आगे पढें

आंबेडकरवादी साहित्य प्रकाशन : स्वरूप, उद्देश्य और कार्य-दृष्टि

आंबेडकरवादी साहित्य प्रकाशन किसी जनसंगठन, अभियान या सदस्यता-आधारित संस्था के रूप में स्थापित नहीं है। इसका स्वरूप मूलतः एक वैचारिक-संपादकीय और प्रकाशन-केंद्र का है। इसका उद्देश्य भीड़-संचालन नहीं, बल्कि विचार-संरचना है; भावनात्मक उत्तेजना नहीं, बल्कि बौद्धिक स्पष्टता है। आज जब साहित्य के नाम पर वैचारिक अस्पष्टता, मिथ्या आरोपण और ऐतिहासिक भ्रम फैलाए जाते हैं, तब … आगे पढें

आंबेडकरवाद और आंबेडकरवादी चेतना

आंबेडकरवाद क्या है? आंबेडकरवाद का अन्य वादों (मानवतावाद, बहुजनवाद, मार्क्सवाद, नारीवाद, बुद्धवाद, सुधारवाद, आदर्शवाद, प्रकृतिवाद, यथार्थवाद, प्रयोजनवाद) से क्या संबंध है? आंबेडकरवादी चेतना क्या है? आंबेडकरवादी चेतना के बिंदु कौन-कौन से हैं? इन प्रश्नों के उत्तर इस लेख में मौजूद हैं। भूमिका डॉ० भीमराव आंबेडकर जी के विचारों से प्रभावित लोग उनकी धारा में शामिल … आगे पढें

GOAL की वैचारिक संरचना और व्यक्ति-पहचान का प्रश्न

आंबेडकरवादी साहित्य के क्षेत्र में कार्यरत किसी भी बौद्धिक मंच के सामने दो प्रश्न अनिवार्य रूप से आते हैं— • पहला, उसकी वैचारिक संरचना क्या है; • और दूसरा, उस संरचना में व्यक्ति-पहचान का स्थान क्या है। GOAL (Guiding Organization for Ambedkarite Literature) के संदर्भ में यह प्रश्न और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि … आगे पढें

आंबेडकरवादी साहित्यकार किसे कहा जाए? क्या ‘आंबेडकरवादी साहित्य’ पत्रिका या प्रकाशन से जुड़ाव अनिवार्य है?

आंबेडकरवादी साहित्य के प्रसार के साथ एक प्रश्न बार-बार सामने आता है—आंबेडकरवादी साहित्यकार किसे माना जाए? और उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह कि क्या ‘आंबेडकरवादी साहित्य’ पत्रिका या प्रकाशन से जुड़ाव आंबेडकरवादी होने की शर्त है? ये प्रश्न केवल पहचान से जुड़े नहीं हैं; ये सीधे-सीधे बौद्धिक स्वतंत्रता, वैचारिक स्वायत्तता और साहित्य की प्रकृति … आगे पढें

क्या आंबेडकरवादी साहित्यकारों का संगठन होना अनिवार्य है?

यह प्रश्न बार-बार उठाया जाता है कि क्या आंबेडकरवादी साहित्य को आगे बढ़ाने के लिए साहित्यकारों का कोई औपचारिक संगठन आवश्यक है। यह प्रश्न केवल संगठनात्मक नहीं है, बल्कि वैचारिक स्वायत्तता, बौद्धिक उत्तरदायित्व और साहित्य की स्वतंत्र प्रकृति से सीधे जुड़ा हुआ है। इस प्रश्न का उत्तर खोजते समय हमें भावनाओं या प्रचलित धारणाओं से … आगे पढें

आंबेडकरवादी साहित्य : वैचारिक स्थिति और विद्वत्-मंडल की भूमिका

GOAL — आंबेडकरवादी साहित्य का विद्वत्-मंडल यह स्पष्ट करना आवश्यक समझता है कि आंबेडकरवादी साहित्य केवल लेखन या प्रकाशन की गतिविधि नहीं, बल्कि एक वैचारिक उत्तरदायित्व है। इस साहित्य की भूमिका सामाजिक न्याय, समता, बौद्धिक ईमानदारी और मानव-गरिमा के मूल्यों को स्पष्ट और सुरक्षित रखना है। वर्तमान समय में आंबेडकरवादी साहित्य के नाम पर सरलीकरण, … आगे पढें