आंबेडकरवाद और आंबेडकरवादी चेतना

— देवचंद्र भारती ‘प्रखर’
आंबेडकरवादी साहित्यकार एवं आलोचक

• शब्दकोश के अनुसार ‘वाद’ का अर्थ है, ” वह दार्शनिक सिद्धांत, जिसके अनुसार संसार की सत्ता उसी रूप में मानी जाती है, जैसी वह सामान्य मनुष्य को दृष्टिगोचर है। ” ‘वाद’ शब्द संस्कृत के ‘वाक्’ शब्द से बना है। ‘वाक्’ का अर्थ है – ‘वाणी’; तथा ‘वाद’ का अर्थ है – कथन, सिद्धांत, विचारधारा। इस प्रकार ‘आंबेडकरवाद का’ अर्थ है – आंबेडकर का कथन, आंबेडकर का सिद्धांत, आंबेडकर की विचारधारा।• डॉ० जयश्री शिंदे जी ने ‘आंबेडकरवाद’ को बहुत ही सटीक शब्दों में परिभाषित किया है। उनके अनुसार, ” अपमानित, अमानवीय, वैज्ञानिक अन्याय एवं असमानता, सामाजिक संरचना से पीड़ित मनुष्य की इसी जन्म में क्रांतिकारी आंदोलन से मुक्ति करके समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व एवं न्याय के आदर्श समाज में मानव और मानव (स्त्री-पुरुष समानता) के बीच सही संबंध स्थापित करने वाली नई क्रांतिकारी मानवतावादी विचारधारा को अंबेडकरवाद कहा जाता है। “

• यदि सामान्य भाषा में और संक्षिप्त रूप में ‘आंबेडकरवाद’ की परिभाषा निश्चित की जाए, तो वह इस प्रकार है – ” बाबा साहेब डॉ० भीमराव आंबेडकर जी के कथनों एवं सिद्धांतों को अपने विचार एवं व्यवहार में अंतर्निहित करना ही ‘आंबेडकरवाद’ कहलाता है। ” (देवचंद्र भारती ‘प्रखर’)

आंबेडकरवादी चेतना

वर्तमान समय को ध्यान में रखते हुए तथा सामाजिक परिवर्तन को स्वीकार करते हुए सच्चे आंबेडकरवादी साहित्यकारों द्वारा साहित्य का जो रूप प्रस्तुत किया गया है, उनमें निहित साहित्यिक विशेषताओं में जो आंबेडकरवादी चेतना है, उन्हें देवचंद्र भारती ‘प्रखर’ ने दस बिंदुओं में सीमित किया है।

व्यवस्थित और क्रमबद्ध रूप में आंबेडकरवादी चेतना के बिंदु हैं –

  1. बुद्ध और उनके धम्म को डॉ० आंबेडकर के दृष्टिकोण से स्वीकार करना।
  2. ईश्वर और आत्मा के अस्तित्व को नकारना।
  3. वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाना।
  4. हिंदू देवी-देवताओं को काल्पनिक मानना तथा उनकी चर्चा भी नहीं करना।
  5. जातिवाद, लिंगवाद और वर्चस्ववाद का विरोध करना।
  6. अंतर्जातीय विवाह का समर्थन करना।
  7. अंधविश्वास, ढोंग और पाखंड की आलोचना करना ।
  8. समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व, न्याय और प्रेम की भावना को धारण करना।
  9. ” शिक्षित हो, संगठित हो और संघर्ष करो ” की प्रेरणा देना।
  10. मैत्री, करुणा और शील का संदेश देना।

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