शोध सारांश
प्रस्तुत शोध-पत्र में दामोदर मोरे की कविताओं में निहित आंबेडकरवादी दृष्टि का विश्लेषण किया गया है। मोरे की काव्य-दृष्टि सामाजिक यथार्थ से सीधे टकराती है और जाति, वर्ण, मनुवाद, धार्मिक पाखंड तथा सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के विरुद्ध वैचारिक प्रतिरोध का स्वर प्रस्तुत करती है। उनकी कविताएँ केवल करुणा या पीड़ा का वर्णन नहीं करतीं, बल्कि परिवर्तन की सक्रिय चेतना को जगाती हैं।
कवि ने सामाजिक विषमता, अस्पृश्यता, श्रम-अपमान, शब्दों की अर्थहीनता, संवैधानिक मूल्यों के अवमूल्यन तथा आज़ादी के अधूरे स्वप्न जैसे प्रश्नों को अपने काव्य का केंद्र बनाया है। उनकी रचनाओं में डॉ. भीमराव आंबेडकर की समतामूलक विचारधारा का प्रभाव स्पष्ट रूप से दृष्टिगत होता है। मोरे के यहाँ ‘आंबेडकर’ केवल एक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि बंजर भूमि की धड़कन, सदियों के दर्द की रोशनी और मनुवाद-विरोधी अग्नि के रूप में उभरते हैं।
कवि सामाजिक संरचना के मिथ्या आदर्शों को विखंडित करते हुए शब्द, धर्म, इतिहास और सत्ता के गठजोड़ को बेनकाब करता है। वह दलित अनुभव को करुण आख्यान तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे आंबेडकरवादी वैचारिक क्रांति में रूपांतरित करता है। इस प्रकार मोरे की कविता संघर्ष, आत्मसम्मान, समता और मानव-मुक्ति की वैचारिक परियोजना का काव्यात्मक रूप है।
बीज शब्द
आंबेडकरवाद, दामोदर मोरे, समता, मनुवाद-विरोध, सामाजिक न्याय, जाति-विमर्श, प्रतिरोध-काव्य, संवैधानिक मूल्य, मानव-मुक्ति।