आंबेडकरवाद और ब्राह्मणवाद : वैचारिक संघर्ष तथा आंतरिक चेतना का प्रश्न

आंबेडकरवादी आंदोलन की वैचारिक स्पष्टता के लिए ब्राह्मणवाद की सटीक समझ अनिवार्य है। जब तक ब्राह्मणवाद को केवल जाति–सूचक शब्द मानकर देखा जाता रहेगा, तब तक आंबेडकरवाद का संघर्ष अधूरा और भ्रमग्रस्त बना रहेगा। यह लेख इसी वैचारिक अस्पष्टता को समाप्त करने तथा आंबेडकरवादी दृष्टि से ब्राह्मणवाद की संरचनात्मक परिभाषा प्रस्तुत करने के उद्देश्य से … आगे पढें

आंबेडकरवादी साहित्य ही क्यों? आंबेडकरवादी साहित्य, दलित साहित्य, बहुजन साहित्य और बौद्ध साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन

इक्कीसवीं सदी के साहित्यिक विमर्श में “दलित साहित्य”, “बहुजन साहित्य”, “बौद्ध साहित्य” और “आंबेडकरवादी साहित्य” को प्रायः एक-दूसरे के समान मान लिया जाता है। यह स्थिति न केवल वैचारिक भ्रम उत्पन्न करती है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की दिशा को भी अस्पष्ट करती है। यद्यपि ये सभी धाराएँ समान सामाजिक यथार्थ से उत्पन्न हुई हैं, तथापि … आगे पढें

आंबेडकरवादी साहित्य को नकारने की चालें और उसका वैचारिक जवाब

दलित साहित्य के कुछ समर्थक पूछते हैं कि दलित साहित्य पर अनेक शोधकार्य हुये हैं, आंबेडकरवादी साहित्य पर कितने शोधकार्य हुये हैं? यानी वे आंबेडकरवादी साहित्य की अवधारणा को नकारते हैं। इसके प्रत्युत्तर में यह लेख प्रस्तुत है। शोध की संख्या से विचारधारा का अस्तित्व तय नहीं होता किसी साहित्यिक अवधारणा की वैधता शोध-प्रबंधों की … आगे पढें

पूर्व-आंबेडकरवादी चेतना साहित्य : आंबेडकरवादी विचारधारा का ऐतिहासिक आधार

समकालीन आंबेडकरवादी साहित्य विमर्श में एक महत्वपूर्ण प्रश्न लगातार उभरता है—डॉ. भीमराव आंबेडकर से पूर्व SC-ST-OBC के साहित्यकारों द्वारा रचित साहित्य को किस श्रेणी में रखा जाए? क्या उसे आंबेडकरवादी साहित्य कहा जाए या उससे पृथक किसी स्वतंत्र परंपरा के रूप में देखा जाए? यह प्रश्न केवल नामकरण का नहीं, बल्कि वैचारिक अनुशासन, ऐतिहासिक विवेक … आगे पढें

दलित साहित्य बनाम आंबेडकरवादी साहित्य : नामकरण नहीं, वैचारिक उत्तरदायित्व का प्रश्न

समकालीन हिंदी साहित्य में “दलित साहित्य” शब्द एक स्थापित पहचान बन चुका है। किंतु इसी के समानांतर “आंबेडकरवादी साहित्य” की अवधारणा अब भी अस्पष्ट, उपेक्षित और अक्सर भ्रमित की गयी श्रेणी बनी हुई है। अनेक लेखक स्वयं को दलित साहित्यकार कहते हैं, डॉ. आंबेडकर का संदर्भ लेते हैं, किंतु न तो वे आंबेडकरवादी वैचारिक परंपरा … आगे पढें

डॉ. आंबेडकर का लेखन और आंबेडकरवादी साहित्य : मूल स्रोत और वैचारिक परंपरा का अंतर्संबंध

आंबेडकरवादी साहित्य की अवधारणा पर विमर्श करते समय प्रायः यह प्रश्न उठता है कि डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा लिखित ग्रंथों को आंबेडकरवादी साहित्य की श्रेणी में रखा जाए या नहीं। यह लेख तर्क करता है कि डॉ. आंबेडकर का लेखन स्वयं आंबेडकरवादी साहित्य नहीं, बल्कि उसका वैचारिक आधार और मूल स्रोत है। आंबेडकरवादी साहित्य एक … आगे पढें

आंबेडकरवादी साहित्य की प्रकृति : एक बहु-विधात्मक वैचारिक चेतना

आंबेडकरवादी साहित्य को किसी एक विधा, शैली या अभिव्यक्ति-रूप में सीमित करना उसके मूल स्वभाव के साथ अन्याय होगा। यह साहित्य न तो केवल कविता है, न मात्र आलोचना, और न ही किसी एक सामाजिक वर्ग की भावनात्मक अभिव्यक्ति। वस्तुतः आंबेडकरवादी साहित्य एक बहु-विधात्मक साहित्यिक चेतना है, जिसका मूल लक्ष्य समाज की असमान संरचनाओं का … आगे पढें

आंबेडकरवादी साहित्य : विचारधारा, सामाजिक चेतना और समकालीन संदर्भ

किसी भी समाज की बौद्धिक दिशा उसके साहित्य से तय होती है। साहित्य केवल शब्दों का संयोजन नहीं होता, बल्कि वह समाज की चेतना, संघर्ष और भविष्यदृष्टि का दस्तावेज़ होता है। आंबेडकरवादी साहित्य भारतीय बौद्धिक परंपरा की वह धारा है जो मनुष्य की गरिमा, समानता और विवेक को केंद्र में रखकर सामाजिक यथार्थ का विश्लेषण … आगे पढें