दलित साहित्य के कुछ समर्थक पूछते हैं कि दलित साहित्य पर अनेक शोधकार्य हुये हैं, आंबेडकरवादी साहित्य पर कितने शोधकार्य हुये हैं? यानी वे आंबेडकरवादी साहित्य की अवधारणा को नकारते हैं। इसके प्रत्युत्तर में यह लेख प्रस्तुत है।
शोध की संख्या से विचारधारा का अस्तित्व तय नहीं होता
किसी साहित्यिक अवधारणा की वैधता शोध-प्रबंधों की संख्या से नहीं, उसके वैचारिक आधार, ऐतिहासिक भूमिका और सामाजिक प्रभाव से तय होती है। यदि यही मापदंड मान लिया जाए, तो प्रारंभिक दौर में “स्त्रीवाद”, “मार्क्सवाद”, “उत्तर-औपनिवेशिक अध्ययन” और “बहुजन विमर्श” को भी अवैध ठहराया जा सकता था।
आंबेडकरवादी साहित्य कोई विश्वविद्यालयी प्रयोग नहीं, बल्कि सामाजिक मुक्ति आंदोलन से जन्मी वैचारिक धारा है। पहले विचारधारा आती है, फिर अकादमिक संरचना बनती है — उल्टा नहीं।
‘दलित साहित्य’ पर शोध हुआ है, पर उसका वैचारिक स्रोत क्या है?
यह प्रश्न पूछने वालों से प्रतिप्रश्न होना चाहिए। दलित साहित्य पर जितना शोध हुआ है, उसका –
• वैचारिक आधार क्या है?
• प्रेरणा कहाँ से आई?
• चेतना किससे बनी?
उत्तर स्पष्ट है — डॉ. आंबेडकर के विचारों से।
यदि दलित साहित्य की चेतना आंबेडकर से आई है, तो आंबेडकरवादी साहित्य को नकारना स्वयं दलित साहित्य की वैचारिक जड़ों को काटना है।
आंबेडकरवादी साहित्य “पहचान नहीं”, “वैचारिक धुरी” है
दलित साहित्य एक सामाजिक पहचान आधारित श्रेणी है, जबकि आंबेडकरवादी साहित्य वैचारिक दिशा है। दलित लेखक भी ब्राह्मणवादी चेतना लिख सकता है, कथित सवर्ण लेखक भी आंबेडकरवादी साहित्य रच सकता है। इसलिए आंबेडकरवादी साहित्य को “जाति आधारित” नहीं, बल्कि चेतना आधारित साहित्यिक आंदोलन के रूप में समझना होगा। जो इसे नहीं समझते, वे साहित्य को समाज से काटकर देखते हैं।
अकादमिक सत्ता की चुप्पी को अवधारणा की कमजोरी नहीं कहा जा सकता
यह भी एक तथ्य है कि विश्वविद्यालयों में :
• आंबेडकरवादी विमर्श को संस्थागत समर्थन नहीं मिला।
• ब्राह्मणवादी अकादमिक प्रभुत्व हावी रहा।
• बहुजन विषयों को हाशिये पर रखा गया।
तो क्या इसका अर्थ यह है कि विषय अस्तित्वहीन है?
नहीं। इसका अर्थ यह है कि ज्ञान-सत्ता पक्षपाती है। जिस दिन विश्वविद्यालयों में वास्तविक सामाजिक न्याय लागू होगा, उस दिन आंबेडकरवादी साहित्य पर शोध की बाढ़ आएगी।
आंबेडकरवादी साहित्य पहले सामाजिक आंदोलन है, बाद में अकादमिक विषय
दलित साहित्य अकादमिक विमर्श से आगे बढ़ा, आंबेडकरवादी साहित्य सड़क, आंदोलन, संगठन, जेल, संघर्ष और संविधान की जमीन से निकला है। इसलिए इसका मूल्यांकन सेमिनारों की गिनती से नहीं, बल्कि समाज पर पड़े प्रभाव से होना चाहिए।
यह प्रश्न वास्तव में किसे बचाने के लिए पूछा जाता है?
यह सवाल अक्सर वे लोग पूछते हैं; जो ब्राह्मणवादी साहित्यिक वर्चस्व बचाना चाहते हैं; जो आंबेडकर को “संविधान तक सीमित” रखना चाहते हैं; जो आंबेडकरवादी चेतना को साहित्यिक सत्ता में प्रवेश नहीं देना चाहते। इसलिए यह सवाल बौद्धिक नहीं, राजनैतिक है।
अंतिम और निर्णायक उत्तर
आंबेडकरवादी साहित्य कोई “अनुमति लेकर बनी अवधारणा” नहीं है। यह उस समाज की चेतना है, जो गुलामी से निकला, संविधान तक पहुँचा, सत्ता को चुनौती दी और अब संस्कृति को पुनर्गठित कर रहा है।
• शोध-प्रबंध इसके पीछे आएंगे।
• विश्वविद्यालय इसके पीछे चलेंगे।
• इतिहास हमेशा यही बताता है।
निष्कर्ष
“दलित साहित्य पर शोध हुआ है” — यह तथ्य है। “आंबेडकरवादी साहित्य पर कम शोध हुआ है” — यह व्यवस्था की विफलता है। “आंबेडकरवादी साहित्य की अवधारणा गलत है” — यह वैचारिक छल है। आंबेडकरवादी साहित्य को नकारना, दरअसल सामाजिक न्याय की वैचारिक धुरी को नकारना है।
– देवचंद्र भारती ‘प्रखर’
मुख्य संपादक, आंबेडकरवादी साहित्य
सही उत्तर, आंबेडकरवादी विचार ही दलित साहित्य का मेरुदंड है।
संत शिरोमणि रविदास, संत कबीर या ज्योतिबा फुले साहित्य या संत गाडगे का साहित्य किस साहित्य की श्रेणी में रखा जाए?
डॉ. आंबेडकर ने कोई विचार शून्य से नहीं गढ़ा। उन्होंने बुद्ध परंपरा, कबीर–रविदास–फुले की सामाजिक चेतना, श्रमिक आंदोलनों और उत्पीड़ित समाज के अनुभवों को वैज्ञानिक ढांचे, संवैधानिक संरचना और राजनीतिक रणनीति में रूपांतरित किया। इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि— पूर्व-आंबेडकरवादी साहित्य आंबेडकरवादी आंदोलन का स्रोत है, न कि उसका विकल्प। यह संबंध विरोध का नहीं, बल्कि वैचारिक उत्तराधिकार का है।….. पूरा लेख पढ़ें 👇
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